बापू ....तेरी बिटिया अब चुप हो गयी है
माथे पर पसीने की बूंदे चमक रही थी , अपने सर पर बोझा लिए वो बहुत तेजी से सड़क पार कर रही थी ,प्रकृति ने मानो सारी खूबसूरती उसपर उड़ेल दी हो , गीत गुनगुनाते हुए बड़ी मस्ती से वो दुनिया से अनजान चली जा रही थी ....
तभी पीछे से किसी ने उसे बड़ी जोर से डांटा ,अगर मजदूरी चाहिए तो जल्दी जल्दी काम करो ....ऐसे गाने से काम नहीं चलेगा , वो बस उसे देखते ही रह गयी ...शायद कह रही हो कमबख्त इस धुप में खुद बोझ उठाकर तो देखो ..
बापू ने बड़े प्यार से उसका नाम लक्ष्मी रखा था , जिसे मुहल्लेवालों ने लछमिनया कहना शुरू कर दिया था , जन्म के साथ ही सब लोग काफी खुश थे ,बिटिया काफी सुन्दर हुई थी और इधर मुखिया जी ने भी उसके बापू को अपने यहाँ काम दे दिया था और उसने पूरे मोहल्ले में मिठाई बांटी थी \
दिन बीतता गया और कब लक्ष्मी अपने यौवनावस्था में आ गयी थी पता ही नहीं चला
इधर सोचते सोचते लक्ष्मी भी बोझा लेकर मुखिया जी के घर पहुँच गयी और बोझ पटकते हुए , मुंशी जी से मजदूरी लेकर चली गयी |
मुखिया जी के आलिशान घर के सामने ही मुसहरों (दलित ) का एक मोहल्ला था ,लक्ष्मी भी उसी मोहल्ले में एक झोपडी में रहती थी |
अब वो झाड़ू पोछा करने के बाद नहाने आ गयी थी , मुखिया जी ने सरकारी फण्ड से ही चापाकल की भी व्यवस्था करा दी थी , इस से पहले सारे मोहल्ले वाले नदी के पानी पर निर्भर थे |जब भी वो नहाने आती थी ,उसे लगता था की मुखिया जी के खिड़की के पीछे शीशे से कोई देख रहा है शुरूआती दिनों में इसे तो उसने भ्रम समझा पर धीरे धीरे उसे लगने लगा की सचमुच वहां कोई खड़ा है क्यूंकि इस समय वहां काफी हलचल रहती थी / उसने ये बात अपने बापू को भी बताई , पर उसने उसे ही झिड़क दिया, पर वो सहने वाली लड़कियों में से नहीं थी ,एक दिन उसने एक पत्थर उठाकर पूरी ताकत से से उस शीशे पर दे मारा शीशे के पीछे देखते ही उसकी आँखे फटी की फटी रह गयी .....
तभी पीछे से किसी ने उसे बड़ी जोर से डांटा ,अगर मजदूरी चाहिए तो जल्दी जल्दी काम करो ....ऐसे गाने से काम नहीं चलेगा , वो बस उसे देखते ही रह गयी ...शायद कह रही हो कमबख्त इस धुप में खुद बोझ उठाकर तो देखो ..
बापू ने बड़े प्यार से उसका नाम लक्ष्मी रखा था , जिसे मुहल्लेवालों ने लछमिनया कहना शुरू कर दिया था , जन्म के साथ ही सब लोग काफी खुश थे ,बिटिया काफी सुन्दर हुई थी और इधर मुखिया जी ने भी उसके बापू को अपने यहाँ काम दे दिया था और उसने पूरे मोहल्ले में मिठाई बांटी थी \
दिन बीतता गया और कब लक्ष्मी अपने यौवनावस्था में आ गयी थी पता ही नहीं चला
इधर सोचते सोचते लक्ष्मी भी बोझा लेकर मुखिया जी के घर पहुँच गयी और बोझ पटकते हुए , मुंशी जी से मजदूरी लेकर चली गयी |
मुखिया जी के आलिशान घर के सामने ही मुसहरों (दलित ) का एक मोहल्ला था ,लक्ष्मी भी उसी मोहल्ले में एक झोपडी में रहती थी |
अब वो झाड़ू पोछा करने के बाद नहाने आ गयी थी , मुखिया जी ने सरकारी फण्ड से ही चापाकल की भी व्यवस्था करा दी थी , इस से पहले सारे मोहल्ले वाले नदी के पानी पर निर्भर थे |जब भी वो नहाने आती थी ,उसे लगता था की मुखिया जी के खिड़की के पीछे शीशे से कोई देख रहा है शुरूआती दिनों में इसे तो उसने भ्रम समझा पर धीरे धीरे उसे लगने लगा की सचमुच वहां कोई खड़ा है क्यूंकि इस समय वहां काफी हलचल रहती थी / उसने ये बात अपने बापू को भी बताई , पर उसने उसे ही झिड़क दिया, पर वो सहने वाली लड़कियों में से नहीं थी ,एक दिन उसने एक पत्थर उठाकर पूरी ताकत से से उस शीशे पर दे मारा शीशे के पीछे देखते ही उसकी आँखे फटी की फटी रह गयी .....
मुखिया जी के माथे से खून निकल रहा था, चारो तरफ हाहाकार मच गया ... घरवालों ने पुलिस को बुला लिया था | पुलिस लक्ष्मी को शाम के समय गिरफ्तार करने आ गयी थी
अरे साहब ! आप गिरफ्तार नहीं कर सकते ,शाम का समय हो गया है , किसी महिला पुलिस को लाइए ..किसी सज्जन ने भीड़ में बोला था |
दरोगा जी ने बड़ी जोर से झिरका था और झूठे केस में फँसाने की धमकी दे दी थी | आखिरकार जबरदस्ती पुलिस लक्ष्मी को उठाकर ले गयी
मुखिया जी के परिवार वालों ने पैसे देकर पूरे मोहल्ले को चुप करा दिया और ये बात फ़ैल गयी की लक्ष्मी एक बदचलन लड़की है
इधर आधी रात को मुखिया जी थाने पहुंचे वहाँ ,उनका जोरदार स्वागत हुआ शराब, शबाब और कबाब सबकुछ की व्यवस्था थी रात भर मुखिया जी भी वही रहें ..

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