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मार्च, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नसीब

हम वफाओं से डरते हैं, तुम जफ़ाओं कि बात करते हो हम अदाओं से डरतें हैं ,तुम सजाओं कि बात करते हो वो बीते लम्हों कि बात थी जब सब दौर में  कुछ अपना था हमें तो दोस्तों ने रुलाया हैं, तुम दुश्मनों कि बात करते हो यहाँ तो बसंत में पत्ते गिर गए ,तुम पतझर कि बात करते हो अब तो  आँखें रूठ गयी मुझसे ,तुम सोने कि बात करते हो मैं  निगाहें मिलाने से डरता हुं,तुम निगाहें चुराने कि बात करते हो मैं किसी को पाने से डरता हुं ,तुम किसी के खोने कि बात करते हो सारा जमाना ही यही हैं" चन्दन"तुम भी ना जाने क्या बात करते हो यहाँ तो प्यार में वो मुझसे रूठ गए, तुम नफ़रत कि बात करते हो .........

बालश्रम :-एक हक़ीक़त

बचपन को लूटते देखा है ,सपनों को टूटते देखा है अपने इन्हीं आँखों से मैंने ,नन्हे जान को पीटते देखा है भूखा पेट ,तरसती आँखें ,अपनों को तड़पती आँखें मैंने इन आँखों को सब कुछ कहते देखा है  सच पूछो तो बचपन को कुछ सहते देखा है जिनके कुछ" अपने" होने थे ,जिन आँखों में सपनें होने थे उन आँखों से मैंने अश्कों को बहते देखा है सच पूछो तो सपनों को ढ़हते देखा है जिन तन पर कपड़े होने थे ,जिन हाथों में पुस्तक होने थे उन हाथों को मैंने आगों में जलते देखा है , सच पूछो तो मैंने यूँ ही बालश्रम को पलते देखा है गाली ही जिसका गाना हो ,थप्पड़ ही जिसका खाना हो ऐसे बालश्रमिक को मैंने रात- रात भर रोते देखा है , सच पूछो तो मैंने उसको सबकुछ खोते देखा है सोना जिसका जोड़ में बीते ,रोना जिसका शोर में बीते मैंने उन आँखों को सबसे डरते देखा है, सच पूछो तो बचपन को मरते देखा है आओ, सब मिलकर एक कसम निभाते हैं बालश्रम के इस रोग को अब दूर भगाते हैं

मेरे शब्द

''मेरे शब्द'' तुम कहाँ खो गए ? ना जानें तुम कहाँ सो गए ? मेरी तलवार कहाने वाले  उनकी ललकार दबाने वाले  मुझे अपनी पहचान दिलाने वाले  ''मेरे शब्द'' तुम कहाँ खो गए ? ना जानें तुम कहाँ सो गए ? रूठों को मनाने वाले अपनों को बनाने वाले ''मेरी मधुशाला'' सजानें वाले ''मेरे शब्द'' तुम कहाँ खो गए ? ना जानें तुम कहाँ सो गए ? मुझे प्यारे ज़ख्म दिलाने वाले नित नए गीत सुनाने वाले अब मैं किस पर नाज़ करूँ? मेरे शब्द अब मैं किस पर साज करूँ? बुझी शमां जलाने वाले ....''मेरे प्यारे शब्द'' अपने कुछ जज्बातों को अब मैं यहीं सुलाता हूँ क्रन्द वेदना की इस बेला में,आज तुम्हें जगाता हूँ आओ ..''मेरे शब्द '' मैं फिर से तुम्हे बुलाता हूँ

मेरे अश्क

 मेरे अश्क ही अक्सर मेरे  राजों को खोल देती है  रात  खामोशी में बीती ,सुबह तकिया बोल देती है  मेरे अल्फाजों को ग़मों का समंदर मत समझना,  अक्सर जहाँ प्यार रूठा हो निगाहें बोल देती हैं  यूँ कब तक छुपाओगे ख़ताओं को ज़माने से,  जहाँ हुस्न बिकता हो  ,महफ़िलें बोल देती हैं  मैं तो मिल भी लेता हूँ उनसे रातों के ख़्वाबों में,  उनका क्या? जिनकी नींदे मोहब्बत छीन लेती है  इस शहर कहीं   वफाओं की तलाश मत करना,  जहाँ प्यार मरता है अक्सर फिजायें बोल देती है  अब वो मोहब्बत में मुझे और कितना सतायेगी,  सुना है दीवानों को अक्सर जुदाई तोड़ देती है।

मोहब्बत में सियासत अच्छी नहीं होती..........

सपने अक्सर टुट जाते हैं ,अपने अक्सर रूठ जाते हैं मोहब्बत कि बहकी फ़िज़ा में दिवाने अक्सर लूट जाते हैं कभी पाक़ मोहब्बत मत करना आशिक़ अक्सर रो देते हैं जिंदगी में कुछ बनकर भी वो ,  सबकुछ अपना खो देते हैं नाक़ाम मोहब्बत अक्सर एक शायर को जन्म दिलाती है जब हर एक अफ़सना, एक परवाने कि याद दिलाती है अब तो हर राह यहाँ पर लथपथ है खूनों कि बौछारो से सच पूछो तो मेरे शब्द भी सुन्न हो गए दिवानो के चीत्कारों से कत्ल हुए जज्बातों से पूछो कितना ये रुलाती है सच्ची मोहब्बत अक्सर ही ,यूँ ही बहुत सताती है अब ,मेरे हर शेर  पर अश्क मत बहाना ,हर निगाहें सच्ची नहीं होती कभी नापाक मोहब्बत मत करना ,मोहब्बत में सियासत अच्छी नहीं होती

मैं लिखूंगा ....

मैं लिखूंगा  प्रिये .... मैं जरूर लिखूंगा ....... मैं उन खूबसूरत लम्हों के लिए लिखूंगा जो मैंने तुम्हारे साथ बिताये थे ......... मैं लिखूंगा क्योंकि मुझे शब्दों में तुम नजर आती हो ये मेरे शब्द नहीं हैं प्रिये , ये तुम हो जिसे में हर पल जीता हूँ मैं उस पल को लिखूंगा ,जिस पल में तुम्हारे नजरों से हार गया था मैं हार कर भी जीत गया था ....और गगन भी मुस्कुरा रहा था मैं आधी रात की उस ख़ामोश हक़ीक़त को भी लिखूंगा ... जब तुम्हारी उँगलियाँ मेरे बालों को सहला रही थी ....... मैं उस तकरार को भी लिखूंगा, जो हम दोनों के बीच होती हैं मैं प्यारे इकरार के लिए लिखूंगा ..मैं अपने प्यार के लिए लिखूंगा अंततः , मैं उन शब्दों को चूमने के लिए लिखूंगा ...प्रिये क्योंकि ये शब्द , मैं सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए लिखूंगा

सबब तुम ही क्यों होते ,हर कुछ हार जाने का...........?

कभी सीता जलाते हो , कभी गीता जलाते हो सबब तुम ही होते हो,सियासत के मुस्कुराने का कभी रिश्वत कमाते हो ,कभी कुर्सी बचाते हो सबब तुम ही होते हो ,चोरों के खिलखिलाने का कभी अपने बचाते हो , कभी दूजे सताते हो  सब ब तुम ही होते हो ,मासूमों के बिलबिलाने का कभी सपने दिखाते हो , कभी वेश्या बनाते हो सबब तुम ही होते हो ,आंसुओं के रूठ जाने का कभी हिन्दू बनाते हो , कभी मुस्लिम बनाते हो सबब तुम ही क्यों होते ? हर कुछ हार जाने का

भ्रूण हत्या :-एक बेटी का सवाल

माँ मुझे आने तो दो, कुछ गुनगुनाने तो दो मैं भी बेटे जैसा नाम करुँगी , बस एक बार अपनी बाँहों में लिपटकर मुस्कुराने तो दो माँ मैं भी पढ़ने जाउंगी ,तभी तो ''संध्या'' बन पाऊँगी तेरे सारे कामों को करके ,मैं राजा बेटा कहलाऊंगी पर माँ मुझे आने तो दो , कुछ कर गुजर जाने तो दो कितने वहशी जल जायेंगे ,एक बार इन नजरों को उठाने तो दो गोद से उठकर जब ये नन्ही गुड़िया आँगन को आएगी देखते रह जाए सब इस चिड़ियाँ  को ये नभ में  उड़ जायेगी नभ में  रहकर भी मैं तेरा ही काम करुँगी ,कल्पना चावला बनकर मैं रौशन तेरा नाम करुँगी ,पर माँ मुझे आने तो दो ये चिड़ियाँ  भी चहक उठेगी ,बस एक बार खिलखिलाने तो दो माँ क्यों मार देते उस नन्ही बच्ची को जिसकी साँसे चलती है माँ मैं चीख भी नहीं पाती ,जब डॉक्टर कि कैंची चलती है सिर्फ एक बार माँ मुझे आने तो दो ,कई सवाल है ,इस दुनिया से इस गूंगी को भी अब इन बेशर्मों से कुछ जवाब अब पाने तो दो माँ मैं भी तो तेरी अंश हूँ ,फिर कैसे ये सब तू सह पाती है तेरी बेटी जो नाम करेगी ,जिन्दा ही मर जाती है / माँ तुझसे बस एक प्रश्न है ,कब तक यूँ ही प्रथा चलाओगी सचमुच ये सब न ब...

मैं लोकतंत्र हुं

मैं लोकतंत्र हुं , सिसकता ,सुबकता ,बिलखता तड़पता , मैं मौनतंत्र हूँ ,मैं लोकतंत्र हूँ गरीबों कि आवाज दबा मैं ,अमीरों कि आवाज बना मैं खुद पर शर्मिंदा , मैं एक शर्मतंत्र हूँ ,मैं लोकतंत्र हूँ नेताओं का निजतंत्र बना मैं ,पूंजीपतियों का षड़यंत्र बना मैं अपने ही बेटों का गला दबाता,मैं एक यमतंत्र हूँ ,मैं लोकतंत्र हूँ घोटालों का सुतंत्र बना मैं ,अबलाओं का कुतंत्र बना मैं अश्रु बहाता खुद के भाग्य पर ,मैं एक भ्रष्टतंत्र हूँ ,मैं लोकतंत्र हूँ ईमानदारों का परतंत्र बना मैं ,बेईमानों का स्वतंत्र बना मैं बन मूक,देखता सब चीजों को ,मैं एक मजबूर तंत्र हूँ ,मैं लोकतंत्र हूँ पर  यह सब  क्या  मेरी गलती है ? अपने ही  बेटो ने मेरा यह हाल किया है जो हसतां था राजतन्त्र पर ,उसका हाल बेहाल किया है , आवाह्न करता फिर भी ,अपनों से, मैं एक बेशर्म तंत्र हूँ ,मैं लोकतंत्र हूँ उठो जागों !ऐ देश के युवा सपूतों ,अब की बारी तुम्हारी है इस बार अगर तुम चुक गए ,तो यह हार तुम्हारी है _

सिसकियाँ # Love story

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