बालश्रम :-एक हक़ीक़त

बचपन को लूटते देखा है ,सपनों को टूटते देखा है
अपने इन्हीं आँखों से मैंने ,नन्हे जान को पीटते देखा है
भूखा पेट ,तरसती आँखें ,अपनों को तड़पती आँखें
मैंने इन आँखों को सब कुछ कहते देखा है 
सच पूछो तो बचपन को कुछ सहते देखा है
जिनके कुछ" अपने" होने थे ,जिन आँखों में सपनें होने थे
उन आँखों से मैंने अश्कों को बहते देखा है
सच पूछो तो सपनों को ढ़हते देखा है
जिन तन पर कपड़े होने थे ,जिन हाथों में पुस्तक होने थे
उन हाथों को मैंने आगों में जलते देखा है ,
सच पूछो तो मैंने यूँ ही बालश्रम को पलते देखा है
गाली ही जिसका गाना हो ,थप्पड़ ही जिसका खाना हो
ऐसे बालश्रमिक को मैंने रात- रात भर रोते देखा है ,
सच पूछो तो मैंने उसको सबकुछ खोते देखा है
सोना जिसका जोड़ में बीते ,रोना जिसका शोर में बीते
मैंने उन आँखों को सबसे डरते देखा है,
सच पूछो तो बचपन को मरते देखा है
आओ, सब मिलकर एक कसम निभाते हैं
बालश्रम के इस रोग को अब दूर भगाते हैं

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उफ्फ.........ये कैसी कहानी Part -1

भ्रूण हत्या :-एक बेटी का सवाल

अधूरी कहानी .....